उत्तराखंड के शहरों में दशहरा पर रावण दहन की तैयारी हो रही है, वही अल्मोड़ा में रावण और रावण के पूरे परिवार का दहन किया जाएगा
By सुरेन्द्र सिंह रावत
•
Oct 20, 2026 09:58
•
133 views
•
0 Comments
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक विजयदशमी पर्व 19 अक्टूबर यानी मंगलवार को देशभर में धूमधाम से मनाया जाएगा, दशहरा उत्सव की तैयारियां पिछले एक महीने से चल रही हैं, जिन्हें अंतिम रूप दे दिया गया है, दरअसल, अल्मोड़ा शहर के स्टेडियम में शाम को रावण और उनके परिवार कुंभकर्ण, मेघनाद सहित पूरे रावण परिवार के पुतलों का दहन किया जाएगा। अल्मोड़ा में दशहरा मनाने की शुरुआत वर्ष 1860 में हुई थी। शुरुआत में केवल रावण का पुतला दहन होता था, लेकिन समय के साथ इसमें अन्य पात्र जुड़ते गए। रावण समेत उसके परिवार और विभिन्न असुरों के कुल 23 पुतले तैयार किए गए हैं। इसमें रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद, अहिरावण, अतिकाय, अक्षय कुमार, खर, दूषण, मारीच, ताड़का, नरांतक, धूम्राक्ष, शुंभासुर, मकरासुर, कालकेतु, कालकासुर, विक्रासुर, कराल, धूमकेतु, वीरत, नरकासुर आदि के पुतले शामिल हैं।
पुतला दहन से पहले अल्मोड़ा के विभिन्न मोहल्लों जैसे जौहरी मोहल्ला, मुंशी बाजार आदि से इन सभी कलात्मक और रंगीन पुतलों की भव्य शोभायात्रा पूरे शहर में निकाली जाती है। इस दौरान ढोल-नगाड़ों और संगीत की गूंज होती है। रावण परिवार के इन सभी पुतलों का दहन अंत में अल्मोड़ा के स्टेडियम मैदान में भव्य आतिशबाजी के साथ किया जाता है। यह आयोजन पहाड़ की लोककला, सामूहिक एकजुटता और अनूठी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी अल्मोड़ा पहुंचते हैं। वर्ष 1936 में जौहरी मोहल्ले में कुंभकर्ण का पुतला बनाए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद धीरे-धीरे रावण परिवार के अन्य पात्र भी इस आयोजन का हिस्सा बनने लगे।
पुतला निर्माण की जिम्मेदारी अलग-अलग मोहल्लों की समितियां और स्थानीय कलाकार संभालते हैं। पात्रों का चयन करने से लेकर ढांचा बनाने और सजावट करने तक कई लोग इसमें योगदान देते हैं। इस परंपरा में सामाजिक सौहार्द की भी झलक देखने को मिलती है। पुतला निर्माण और सजावट के काम में अलग-अलग समुदायों के लोगों की भागीदारी रही है। सामूहिक प्रयासों से यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। दशहरे के दिन सभी पुतलों को ढोल-नगाड़ों के साथ शहर के बाजारों से जुलूस के रूप में निकाला जाएगा। इसके बाद स्टेडियम के समीप निर्धारित स्थल पर इनका दहन होगा। देश के कई शहरों में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन प्रमुख आकर्षण होता है, जबकि अल्मोड़ा में रावण पक्ष के अनेक पात्रों को शामिल करने की परंपरा इसे अलग पहचान देती है। पुतलों की कलात्मकता, कलाकारों की मेहनत और मोहल्लों की भागीदारी ने अल्मोड़ा के दशहरे को कुमाऊं की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बना दिया है।
सुरेन्द्र सिंह रावत
Verified Reporter
Professional journalist writing regular analytical and research reports on key political, cultural, and technological fields globally.
Comments (0)
No comments yet. Be the first to share your thoughts!