अल्मोड़ा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा विजयादशमी उत्सव एवं पथ संचलन कार्यक्रम आयोजित की गई
By सुरेन्द्र सिंह रावत
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Oct 11, 2025 12:09
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अल्मोड़ा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अल्मोड़ा द्वारा विजयादशमी उत्सव का भव्य आयोजन डाइट ग्राउंड, अल्मोड़ा में किया गया।कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के...
अल्मोड़ा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अल्मोड़ा द्वारा विजयादशमी उत्सव का भव्य आयोजन डाइट ग्राउंड, अल्मोड़ा में किया गया।कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में श्री सुनील जी, प्रांत शारीरिक प्रमुख, उत्तराखंड प्रांत उपस्थित रहे।इस अवसर पर तीन बस्तियों जाखनदेवी, विवेकानंदपुरी एवं शिवाजी नगर के स्वयंसेवकों ने एकत्र होकर संघ के प्रति अपनी निष्ठा, अनुशासन और संगठन की भावना का परिचय दिया। एकत्रीकरण एवं पथ संचलन कार्यक्रम का एकत्रीकरण डाइट ग्राउंड में हुआ। तत्पश्चात पथ संचलन का आयोजन किया गया, जो डाइट फील्ड से प्रारंभ होकर गणेश मंदिर मार्ग से होते हुए शिवाजी नगर में संपन्न हुआ। नगरवासियों ने पुष्प वर्षा कर स्वयंसेवकों का स्वागत किया, जिससे वातावरण में देशभक्ति और उत्साह की अद्भुत झलक दिखाई दी।
मुख्य वक्ता का उद्बोधन वक्ता सुनील, प्रांत शारीरिक प्रमुख, ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में संघ के विविध पक्षों पर विस्तृत प्रकाश डाला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रारम्भिक जानकारी उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के पावन दिन की थी। इसका उद्देश्य भारत को एक सशक्त, संगठित और आत्मगौरव से परिपूर्ण राष्ट्र के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना था।
संघ का कार्य किसी विशेष क्षेत्र या जाति तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के उत्थान हेतु समर्पित है।
डॉ0 हेडगेवार जी ने कांग्रेस क्यों छोड़ी उन्होंने विस्तार से बताया कि डॉ. हेडगेवार जी प्रारंभ में कांग्रेस में सक्रिय थे, परंतु समय के साथ उन्हें अनुभव हुआ कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।
राष्ट्र का वास्तविक उत्थान तभी संभव है जब समाज का चरित्र, संस्कार और एकता दृढ़ हो। इसी विचार के आधार पर उन्होंने कांग्रेस छोड़कर एक ऐसी संगठनात्मक व्यवस्था का निर्माण किया जो व्यक्ति निर्माण पर केंद्रित हो और वही था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ का अखाड़े से शाखा तक का सफर वक्ता ने बताया कि प्रारंभिक काल में संघ की शाखाएँ पारंपरिक “अखाड़े” की शैली में संचालित होती थीं, जहाँ शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक प्रशिक्षण दिया जाता था।
धीरे-धीरे यह व्यवस्था विकसित होकर आज की “शाखा प्रणाली” में परिवर्तित हुई, जहाँ प्रतिदिन समाज जीवन के आदर्शों, अनुशासन और सेवा भाव का अभ्यास कराया जाता है। स्वयंसेवक किसी जात को नहीं मानता, उन्होंने कहा कि संघ का स्वयंसेवक किसी जाति, धर्म, क्षेत्र या भाषा के भेद में विश्वास नहीं करता।
संघ में सब एक ही वंदना में, एक ही परंपरा में, और एक ही राष्ट्रभक्ति की भावना में बंधे हैं। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि “संघ का स्वयंसेवक वह व्यक्ति है जो मैं नहीं, बल्कि हम की भावना से कार्य करता है। स्वयंसेवक अपनी पहचान स्वयं बनाता है, उन्होंने कहा कि संघ का स्वयंसेवक किसी परिचय-पत्र या नाम से नहीं जाना जाता, बल्कि उसके आचरण, सेवा और विनम्रता से उसकी पहचान बनती है।
जहाँ भी वह कार्य करता है, वहाँ उसके व्यवहार से समाज स्वयं उसे पहचान लेता है — यही संघ का चरित्र निर्माण का उद्देश्य है।
विजयादशमी का पर्व ‘असत्य पर सत्य की विजय’ का प्रतीक है।
संघ इस अवसर को आत्ममंथन और संकल्प के रूप में मनाता है।
वक्ता ने कहा कि प्रत्येक स्वयंसेवक को इस दिन यह निश्चय करना चाहिए कि वह अपने समाज, राष्ट्र और संस्कृति के उत्थान हेतु निःस्वार्थ भाव से कार्य करेगा।
शताब्दी वर्ष के पंच परिवर्तन की रूपरेखा सुनील ने बताया कि संघ अपने शताब्दी वर्ष (2025–2026) में ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव का संकल्प ले रहा है ,व्यक्ति परिवर्तन, परिवार परिवर्तन, समाज परिवर्तन, संगठन विस्तार, राष्ट्र जागरण। इन पांच आयामों के माध्यम से संघ अपने आगामी शताब्दी काल में एक सशक्त और समरस भारत के निर्माण का ध्येय रखता है।
सहभागिता विवरण इस प्रकार रही, महिलाएँ: 21, सज्जन: 35,बाल: 1,गणवेशधारी स्वयंसेवक: 51 कुल 108 स्वयंसेवक एवं नागरिक सहभागिता। कार्यक्रम शिस्तबद्ध, ऊर्जावान एवं प्रेरणादायक रहा। संपूर्ण आयोजन में अनुशासन, समयपालन और सामूहिकता का अनुपम उदाहरण देखने को मिला।
सुरेन्द्र सिंह रावत
Verified Reporter
Professional journalist writing regular analytical and research reports on key political, cultural, and technological fields globally.
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