अल्मोड़ा शोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय में बच्चों के भविष्य के साथ मजाक, बिना मान्यता के संचालित हो रही एमएड
By सुरेन्द्र सिंह रावत
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Sep 08, 2026 22:32
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अल्मोड़ा शोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। कानून की मान्यता को लेकर उठे विवाद के बाद अब शिक्षक शिक्षा के अहम पाठ्यक्रम एमएड की एनसीटीई मान्यता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप यह है कि विश्वविद्यालय में एमएड की पढ़ाई और प्रवेश प्रक्रिया चल रही है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) की वर्तमान मान्यता को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि एमएड कोई सामान्य पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षक शिक्षा से जुड़ा व्यावसायिक पाठ्यक्रम है। ऐसे पाठ्यक्रम के संचालन में नियामकीय मान्यता और निर्धारित मानकों का पालन विद्यार्थियों के भविष्य से सीधे जुड़ा होता है।
सवाल यह है कि यदि मान्यता की स्थिति स्पष्ट नहीं है तो विद्यार्थियों को प्रवेश किस आधार पर दिया जा रहा है? और इससे भी बड़ा सवाल—यदि भविष्य में मान्यता को लेकर कोई आपत्ति सामने आती है तो उन विद्यार्थियों की जिम्मेदारी कौन लेगा, जिन्होंने विश्वविद्यालय पर भरोसा करके फीस जमा की, पढ़ाई की और डिग्री हासिल की? विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग से जुड़े उपलब्ध दस्तावेजों में एमएड पाठ्यक्रम के संचालन और प्रवेश क्षमता का उल्लेख मिलता है। लेकिन एनसीटीई स्तर पर वर्तमान मान्यता की स्थिति को लेकर स्पष्टता का अभाव गंभीर चिंता पैदा करता है। वर्ष 2020 में कुमाऊं विश्वविद्यालय से अलग होकर सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया था। नए विश्वविद्यालय के सामने व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के संचालन और नियामकीय व्यवस्थाओं को मजबूत करने की चुनौती थी। ऐसे में वर्षों बाद भी एमएड की मान्यता को लेकर सवाल उठना विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय में प्रवेश लेते समय यह मानकर चलते हैं कि संस्थान उन्हें नियमानुसार मान्य पाठ्यक्रम और डिग्री उपलब्ध कराएगा। ऐसे में मान्यता की स्थिति स्पष्ट करना विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी है, विद्यार्थियों की नहीं।
पूरे मामले को और गंभीर बनाने वाला पहलू विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. देवेंद्र सिंह बिष्ट का बयान है। उनका कहना है कि एमएड की मान्यता से संबंधित कार्रवाई शिक्षा संकाय के विभागाध्यक्ष स्तर से की जाती है। इसके बाद संबंधित फाइल शासन को भेजने के लिए कुलसचिव कार्यालय को उपलब्ध कराई जाती है, यह बयान अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। यदि कुलसचिव कार्यालय तक मान्यता संबंधी फाइल नहीं पहुंची है तो एमएड की मान्यता की प्रक्रिया आखिर किस स्तर पर है? क्या संबंधित विभाग ने मान्यता के लिए आवश्यक कार्रवाई पूरी की है? यदि नहीं, तो विद्यार्थियों को प्रवेश किस आधार पर दिया जा रहा है? क्या उन्हें मान्यता की वास्तविक स्थिति लिखित रूप में बताई गई है? और सबसे महत्वपूर्ण—जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था कहां है? वर्तमान में एमएड कर रहे विद्यार्थियों और पहले ही पाठ्यक्रम पूरा कर चुके छात्रों की चिंता सबसे बड़ी है। यदि मान्यता को लेकर भविष्य में कोई नियामकीय आपत्ति आती है तो उनकी डिग्री की स्वीकार्यता, रोजगार और आगे की पढ़ाई पर असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में विश्वविद्यालय केवल यह कहकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि मान्यता की कार्रवाई विभागाध्यक्ष स्तर पर होती है। विद्यार्थी विभाग में नहीं, विश्वविद्यालय में प्रवेश लेते हैं। फीस विश्वविद्यालय को देते हैं और डिग्री भी विश्वविद्यालय से ही हासिल करते हैं।
इसलिए मान्यता, नियामकीय अनुपालन और विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा की अंतिम जवाबदेही से विश्वविद्यालय प्रशासन खुद को अलग नहीं कर सकता। एमएड की मान्यता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब अब केवल मौखिक बयान से नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों से दिया जाना चाहिए। विश्वविद्यालय को साफ करना चाहिए कि एमएड की वर्तमान एनसीटीई मान्यता की स्थिति क्या है? पाठ्यक्रम किस मान्यता आदेश या प्रमाणपत्र के आधार पर संचालित हो रहा है? वर्तमान सत्र में प्रवेश देने का आधार क्या है? नई मान्यता अथवा नवीनीकरण की प्रक्रिया कब शुरू की गई? संबंधित आवेदन या फाइल वर्तमान में किस स्तर पर लंबित है? मान्यता प्रक्रिया लंबित होने की स्थिति में विद्यार्थियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई? पहले ही एमएड पूरा कर चुके विद्यार्थियों की डिग्री की वैधता की जिम्मेदारी कौन लेगा? जवाबदेही से बचने की कोशिश तो नहीं? मामला सिर्फ एनसीटीई मान्यता का नहीं है। यह विश्वविद्यालय की पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है। यदि एमएड पूरी तरह नियमानुसार संचालित हो रहा है तो विश्वविद्यालय को संबंधित एनसीटीई दस्तावेज सार्वजनिक कर तमाम सवालों पर विराम लगाना चाहिए। लेकिन यदि मान्यता की प्रक्रिया वास्तव में लंबित है, तो विद्यार्थियों को पूरी जानकारी दिए बिना प्रवेश और पढ़ाई जारी रखने पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुरेन्द्र सिंह रावत
Verified Reporter
Professional journalist writing regular analytical and research reports on key political, cultural, and technological fields globally.
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