उत्तराखंड

देहरादून में चाय बागान घोटाला, भरती रही माफिया और अफसरों की जेब,कोई सुध लेने वाला नहीं

सुरेन्द्र सिंह रावत By सुरेन्द्र सिंह रावत Jul 12, 2025 09:17 1 views 0 Comments
देहरादून में चाय बागान घोटाला, भरती रही माफिया और अफसरों की जेब,कोई सुध लेने वाला नहीं

देहरादून में चाय बागान की आड़ में लाडपुर क्षेत्र में (रिंग रोड) जिन जमीनों को सीलिंग एक्ट से छूट मिली थी, वहां आज दूर-दूर तक चाय की खेती का नामो-निशा...

देहरादून में चाय बागान की आड़ में लाडपुर क्षेत्र में (रिंग रोड) जिन जमीनों को सीलिंग एक्ट से छूट मिली थी, वहां आज दूर-दूर तक चाय की खेती का नामो-निशान नहीं है। चाय बागान उजड़ता रहा और माफिया समेत नेताओं और अफसरों की जेब हरी होती रही। स्थिति यह है कि करीब 350 बीघा क्षेत्रफल पर फैले चाय बागान की भूमि पूरी तरह खुर्द-बुर्द कर दी गई है।

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इस पूरे खेल में सबसे गंभीर बात यह रही कि जिस कुंवर चंद्र बहादुर (पुत्र शमशेर बहादुर) के नाम पर चाय बागान को सीलिंग से छूट दी गई थी, उनके नाम के फर्जी दाननामा और वसीयत, पावर आफ अटार्नी बनाकर माफिया ही जमीनों को बेचते रहे। 30 बीघा के एक भूखंड में इस फर्जीवाड़े को जिला प्रशासन ने पकड़ा भी, बावजूद इसके सरकारी तंत्र चाय बागान की जमीनों को मुक्त कराने की इच्छाशक्ति नहीं दिखा पा रहा है।

फर्जीवाड़े का यह खेल लाडपुर क्षेत्र में खसरा नंबर 203, 204 और 205 में पकड़ा गया था। यह जमीन संतोष अग्रवाल नाम के भूमाफिया ने अपने नाम चढ़ा दी थी। इस खेल को अंजाम देने के लिए उसने सफेदपोशों की शह पर दावा पेश किया कि यह भूमि उनकी मां चंद्रावती की है। कहा गया कि चंद्रावती ने जमीन कुंवर चंद्र बहादुर से वर्ष 1988 में खरीदी थी और उसी दौरान उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। खेल को अंजाम देने के लिए वर्ष 2019 में चंद्रावती का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाया गया और वर्ष 2020 में जमीन को मिलीभगत कर संतोष अग्रवाल के नाम दर्ज करा दिया गया।

हालांकि, तत्कालीन अपर जिलाधिकारी (प्रशासन)/सीलिंग अधिकारी डा एसके बरनवाल ने स्पष्ट किया कि चाय बागान का स्वरूप समाप्त होते ही या उसके विक्रय के साथ ही जमीन सरकार में निहित हो जाती है। लिहाजा, वर्ष 1988 में की गई बिक्री शून्य है और जमीन को सरकार में निहित कर दिया गया था।

इसी के साथ यह बात भी सामने आई थी कि संतोष अग्रवाल की तरह कुमुद वैद्य, आरती कुमार और दीपचंद्र अग्रवाल ने भी चाय बागान की जमीनों पर कब्जे के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए हैं। कुछ समय तक जिला प्रशासन के तत्कालीन अधिकारियों ने सरकार में निहित जमीन पर कब्जा लेने का प्रयास भी किया, लेकिन कुछ समय बाद ही सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वर्तमान में बेहद कम भूमि सरकार के कब्जे में है। अभी भी तमाम निर्माण चाय बागान की भूमि पर गतिमान हैं।

चाय बागान की जमीनों पर निर्बाध कब्जे के लिए भूमाफिया ने तत्कालीन त्रिवेंद्र सरकार में भाजपा प्रदेश संगठन को भी चुग्गा डाला था। उस समय रिंग रोड पर चाय बागान की जमीन भाजपा प्रदेश संगठन को जमीन बेची गई थी। जिसकी रजिस्ट्री तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने करवाई थी। हालांकि, चाय बागान की जमीनों को खुर्द-बुर्द करने का खेल उजागर होने के बाद भाजपा ने इस जमीन से पल्ला झाड़ लिया था।

सुरेन्द्र सिंह रावत

सुरेन्द्र सिंह रावत

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Professional journalist writing regular analytical and research reports on key political, cultural, and technological fields globally.

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