1962 में भारत-चीन युद्ध में दुश्मन से लोहा लेते हुए दी प्राणों की आहुति, बलिदान के 63 साल बाद मिलेगा पहली बार सम्मान

पौड़ी गड़वाल में 1962 में भारत-चीन युद्ध में दुश्मन से लोहा लेते हुए प्राणों की आहुति देने वाले पौड़ी जिले की असवालस्यूं पट्टी के ग्राम थैर निवासी लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी को भले ही मरणोपरांत वीरचक्र से सम्मानित किया गया हो, लेकिन वर्तमान पीढ़ी उनकी वीरगाथा से अनभिज्ञ है। इसलिए बलिदानी त्रिलोक सिंह को गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट की ओर से 63 वर्ष बाद पहली बार आज (17 नवंबर) नूरानांग दिवस पर उनकी पैतृक भूमि में ‘गार्ड आफ आनर’ दिया जा रहा है। सेना ने प्रतिवर्ष थैर में कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय भी लिया है।

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समारोह सतपुली के निकट थैर के मुख्य बाजार बौंसाल में आयोजित हो रहा है। इस मौके पर उनकी स्मृति में बने शौर्यद्वार का अनावरण भी होगा। शौर्यद्वार पर उनकी गाथा भी अंकित है, ताकि नई पीढ़ी उनके पराक्रम और शौर्य से परिचित हो सके। बता दें कि 17 नवंबर 1962 को भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश की नूरानांग पोस्ट पर दुश्मन से लोहा लेते हुए लांसनायक त्रिलोक सिंह समेत 140 जवान बलिदान हो गए थे। ‘हीरो आफ द नेफा’ राइफलमैन जसवंत सिंह नेगी ने इस युद्ध में अद्भभुत शौर्य का परिचय देते हुए दुश्मन से 72 घंटे तक लोहा लिया और 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया।

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तीन दिसंबर 1940 को थैर गांव में बकला देवी व चित्र सिंह नेगी के घर जन्मे त्रिलोक सिंह दो दिसंबर 1958 को 18 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती हुए। सात जनवरी 1960 को प्रशिक्षण पूरा कर वे चतुर्थ गढ़वाल का हिस्सा बने।17 नवंबर 1962 को गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन की एक कंपनी नूरानांग ब्रिज की सुरक्षा में तैनात हुई। इसी दिन चीनी सैनिकों की एक प्लाटून ने एमएमजी के डिफेंस पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी।

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राइफलमैन जसवंत सिंह व राइफलमैन गोपाल सिंह के साथ लांसनायक त्रिलोक सिंह दुश्मनों की पोस्ट को बर्बाद करने के लिए मुकाबले में डट कए। त्रिलोक सिंह साथियों की कवर फायरिंग के बीच रेजिमेंट के उद्घोष ‘जय बदरी विशाल’ की गर्जना करते हुए दुश्मन पर कहर बनकर टूट पड़े। हालांकि, दुश्मन की गोलियों की बौछार के चलते वह बलिदान हो गए।

त्रिलोक सिंह का विवाह फरवरी 1962 में माहेश्वरी देवी के साथ हुआ। तब वह तीन दिन के लिए पैतृक गांव थैर पहुंचे थे और चौथे दिन ड्यूटी पर लौट गए। फिर माहेश्वरी देवी से वह कभी नहीं मिले।17 नवंबर 1962 को जब माहेश्वरी देवी को पति के बलिदान की खबर मिली, तो वह हमेशा के लिए गहरे सदमे में चली गईं। इसी वर्ष अक्टूबर में उनके पिता चित्र सिंह का देहांत हो गया और कुछ समय बाद मां भी चल बसीं। त्रिलोक सिंह परिवार के इकलौते चिराग थे और पूरे परिवार के समाप्त होने के कारण उनकी शौर्यगाथा भी अतीत के पन्नों में दफन हो गई।

बलिदानी त्रिलोक सिंह के पड़ोसी गांव रिठोली के रहने वाले गढ़वाल राइफल्स के अभिलेख कार्यालय में तैनात मेजर पालेंद्र सिंह ने उनकी स्मृति में शौर्यद्वार बनाने का बीड़ा उठाया। गढ़वाल रेजिमेंट के कमांडेंट ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी व चतुर्थ बटालियन के कमान अधिकारी कर्नल प्रीतम सिंह के समक्ष उन्होंने यह प्रस्ताव रखा, जिसे तुरंत हरी झंडी मिल गई। इसके बाद बलिदानी की याद में उनके पैतृक गांव में शौर्यद्वार का निर्माण हुआ। मेजर पालेंद्र सिंह ने बताया कि इस कार्यक्रम में क्षेत्रीय ग्रामीणों के साथ भूतपूर्व सैनिक भी बड़ी संख्या में भागीदारी करेंगे।

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