माँ नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा ज्यूंरागली और रूपकुंड जैसे दुर्गम रास्तों को पार कर शिलासमुद्र पहुंची, आज कैलास के लिए विदा होगी मां
By सुरेन्द्र सिंह रावत
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Sep 20, 2026 12:29
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बारह साल बाद कैलास विदा हो रही हिमालय की अधिष्ठात्री देवी नंदा की बड़ी जात पातर नचौणियां से छेड़ी नाग, रूपकुंड, ज्यूंरागली व थाला उलारी की पथरीली राह नापते हुए शनिवार को शिलासमुद्र पहुंच गई। मां नंदा देवी यहां से होमकुंड पहुंचेगी। जहां से मां को कैलास के लिए विदा किया जाएगा। इसके बाद यात्री जामुनडाली के लिए वापसी करेंगे। इससे पहले, रूपकुंड से ज्यूंरागली पहुंचने पर मां नंदा भावुक हो गईं और उन्होंने बंड भूम्याल के प्रति स्नेह जताया। नंदा पथ की दुर्गम एवं पथरीली राह कदम-कदम पर नंदा भक्तों की परीक्षा ले रही थी। लेकिन, भक्त इस राह पर ऐसे आगे बढ़ रहे थे, जैसे उन्हें इस सबकी परवाह ही नहीं है।
रूपकु़ंड की सुंदरता ने तो उन्हें सम्मोहित-सा कर दिया। रूपकुंड को नर कंकालों की झील कहा जाता है, क्योंकि इसमें सदियों पुराने नर कंकाल बिखरे पड़े हैं। इन्हें नंदा देवी बड़ी जात के इतिहास से जोड़कर देखा जाता है। इस झील में व्यक्ति अपना प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से देख सकता है। चार बार की बड़ी जात में शामिल बंड मंदिर समिति के संरक्षक शंभू प्रसाद ने बताया कि यह उनकी चौथी बड़ी जात है। लोक मान्यता के हवाले से वह बताते हैं कि मां नंदा को कैलास जाने के लिए जब ज्यूरांगली से आगे रास्ता नहीं मिल पाता, तब बंड भूम्याल अपने अस्त्र कटार से आगे की राह बनाते हैं। इसके बाद ही नंदा वहां से ताला उलारी व शिलासमुद्र होते हुए होमकुंड पहुंचती है। समुद्रतल से 14,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक अत्यंत दुर्गम एवं रहस्यमयी पड़ाव शिला समुद्र चारों ओर शिलाओं से घिरा हुआ है। जहां नजर दौड़ाओ, वहां बड़े-बड़े पत्थरों के सिवा और कुछ नजर नहीं आता। लगता है, जैसे हम शिलाओं के समुद्र में आ गए हैं।
सुरेन्द्र सिंह रावत
Verified Reporter
Professional journalist writing regular analytical and research reports on key political, cultural, and technological fields globally.
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