देश में चांद पर पहुंचने की हो रही कोशिश, उत्तराखंड में आज भी कंधे पर अस्पताल पहुंच रहे मरीज

आज इंसान अपने आविष्कार से धरती से लेकर अंतरिक्ष तक का सफर तय कर चुका है, लेकिन उत्तराखंड में आज भी मरीज और घायल कंधे पर अस्पताल पहुंच रहे हैं, उत्तराखंड राज्य को बने 25 साल होने जा रहे हैं, अगले साल राज्य अपना सिल्वर जुबली मनाएगा, लेकिन अभी भी पहाड़ के हालात ज्यादा कुछ नहीं बदले हैं, आज भी रहवासी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं, आए दिन कहीं न कहीं से ऐसी तस्वीरें सामने आ जाती है, जो सरकार और सिस्टम की पोल खोल जाती हैं।

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खासकर पहाड़ों में आज भी हालात ज्यादा नहीं बदले हैं.l, पहले भी मरीजों और घायलों के लिए डंडी कंडी का सहारा था, आज भी वही हालात हैं, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं की कमी के चलते कई लोग असमय ही जान गंवा चुके हैं, लेकिन सरकार और उनके नुमाइंदे दावा करते हैं कि कोने-कोने तक तमाम मूलभूत सुविधाएं पहुंचा दी गई है, लेकिन उन दावों की पोल कंधों और पीठ लदे मरीजों की तस्वीरें खोल देती है।

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सूबे में सबसे ज्यादा कमी स्वास्थ्य और सड़क सुविधा की खलती है, पहाड़ों में अगर कोई बीमार या घायल हो जाए या फिर कोई गर्भवती महिला हो तो उसे अस्पताल पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है, पहले तो डंडी कंडी, डोली, कुर्सी का इंतजाम करना पड़ता है, फिर उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए युवाओं को इकट्ठा करना पड़ता है, कई गांवों में तो युवाओं के रोजगार या नौकरी की तलाश में बाहर जाने की वजह से मरीजों और घायलों को अस्पताल पहुंचाने में परेशानी होती है।

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ग्रामीण पैदल ही कई किलोमीटर मरीजों, घायलों और गर्भवती को लेकर अस्पताल के लिए निकलते हैं, अगर किसी तरह से उन्हें सड़क मार्ग तक पहुंचा दिया जाता है तो फिर वहां से अस्पताल पहुंचाने की दिक्कत खड़ी हो जाती है, ऐसे में कई मरीज को रास्ते में दम तोड़ देते हैं,  इसके बाद नजदीकी अस्पताल पहुंच भी गए तो कहीं डॉक्टर नहीं होते हैं तो कहीं स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, जिसके चलते उन्हें हायर सेंटर रेफर करना पड़ जाता है, तब जाकर कहीं इलाज मिल पाता है।

उधर, सरकार दावा करती है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए-नए मुकाम हासिल कर रही है, अस्पतालों में डॉक्टरों की और अन्य स्टाफ की कमी को समय-समय पर भरा जा रहा है, एयर एंबुलेंस से लोगों को अस्पताल पहुंचाने की बात भी कही जाती है, लेकिन सरकार और सिस्टम के इन दावों की पोल खोलती ही तस्वीरें आए दिन सामने आ जाती है, ऐसी ही कुछ तस्वीरें हाल ही के दिनों में देखने को मिले हैं. जो बताती हैं कि पहाड़ के लोगों का जीवन कितना मुश्किलों भरा है।

धनौल्टी से लगे ग्राम पंचायत गोठ में लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं में से एक सड़क के लिए जूझ रहे हैं,  आज भी गांव के लोग सड़क से ढाई किमी की दूरी तय कर गांव पहुंचते हैं, सबसे ज्यादा परेशानी मरीजों और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल लाने और ले जाने में होती है, इससे पहले सड़क के अभाव में कई लोग अस्पताल जाने से पहले ही दम तोड़ चुके हैं, ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से सड़क निर्माण की गुहार लगाई है।

सुनील चमोली ने बताया कि बीते 10 सितंबर को उनकी माता शीला देवी का स्वास्थ्य रात को अचानक खराब हो गया था, जो कि चलने की हालत में नहीं थी, ऐसे में उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए उन्होंने ग्रामीणों को इकठ्ठा कर रात के अंधेरे और बारिश में ही कुर्सी व कंडी के सहारे घनघोर जंगल के रास्ते ढाई किलोमीटर की पैदल चढ़ाई से धनोल्टी तक लाए, जिन्हें लाने में करीब 5 से 6 घंटे लगे, उसके बाद जौलीग्रांट अस्पताल ले गए।

जहां डॉक्टरों ने बताया कि अगर कुछ देर होती तो महिला की जान खतरे में पड़ सकती थी, महिला के उपचार के बाद कल यानी 25 सितंबर को महिला को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया, फिर उसे धनोल्टी से गांव तक कुर्सी में बैठाकर घर पहुंचा गया, गौर हो कि कुछ महीने पहले ही गर्भवती मधु देवी पत्नी देवेंद्र प्रसाद को चारपाई के सहारे अस्पताल तक ले जाया गया, लेकिन उनका रास्ते में ही डिलीवरी हो गई थी, जिसमें नवजात की मौत हो गई थी, किसी तरह प्रसूता को बचाया गया, इसी तरह गांव के दर्शन लाल चमोली की भी अस्पताल ले जाते समय मौत हो चुकी है।

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